मारो सर! और मारो!! पेपर लीक के खिलाफ जंतर-मंतर पर चल रहे प्रोटेस्ट के दौरान एक नौजवान की यह ललकार भारत के युवाओं द्वारा रचे जा रहे नए इतिहास का उद्घोष है और नये भारत के निर्माण का घोषणा पत्र है। सिर से पैर तक खून से लथपथ यह नौजवान चारों तरफ़ लाठी और बंदूक से लैस पुलिस से घिरे होने के बावजूद ललकारते हुए उन्हें आमंत्रण दे रहा है। “मारो सर और मारो। मैं शहीद हूं। हर युग में जन्म लूंगा और शहीद होता रहूंगा “।मैं हर युग में जुल्म के खिलाफ संघर्ष की नई ऊर्जा के साथ धरती पर जन्म लूंगा। इसलिए और मारो। मैं हर युग का शहीद हूं। ”
भारत बदल रहा है
मैं उस नौजवान को नहीं जानता। उसका नाम क्या है? भारत की यथार्थ सामाजिक संरचना में वह किस धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र से है। लेकिन मैं इतना ज़रूर जानता हूं कि जब तारीख आगे कदम बढ़ाने के लिए जड़ और प्रगति विरोधी ताकतों द्वारा खड़े किए गए अवरोधों से संघर्ष कर रही होती है। तो ऐसे दौर में ही भविष्य के नायक धमाकेदार आवाज के साथ अपना दावा पेश करते हैं। उनके कदमों की पदचाप और गति इतना तेज और ताकतवर होती है कि क्रूर से क्रूर शासकों द्वारा खड़े किए गए सारे अवरोध ताश के पत्तों की तरह हवा में बिखर जाते हैं।
इस ठोकर से इतिहास का पहिया तूफानी वेग से सारे अवरोधों को छिन्न-भिन्न करते हुए अपने रास्ते पर आगे बढ़ जाता है। लगता है 20 जुलाई, 2026 आजाद भारत के इतिहास के पन्नों में इसी तरह दर्ज होने वाला है। इसके चाहे जो भी परिणाम निकलें। लेकिन इतना तो तय है कि भारत वह नहीं रहने वाला है। जो 20 जुलाई 2026 के पहले था।
कम्पनी राज दो
वर्तमान लोकतांत्रिक भारत कॉर्पोरेट हिंदुत्व गठजोड़ के मनुष्य विरोधी क्रूर शिकंजे से संघर्ष में मुब्तिला है। शायद समय का पहिया लोकतंत्र की आकांक्षा लिए हुए अपने स्वाभाविक गति से आगे बढ़ते हुए उस मंजिल पर पहुंच गया है। जहां से भारत कॉर्पोरेट हिंदुत्व फासीवाद यानी “कम्पनी- राज दो ” के खिलाफ सर्वथा नये तरह के स्वतंत्रता संघर्ष लड़ने के लिए अपने पर तौल रहा है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर बलिदान देने के लिए उद्यत युवाओं के दृढ़ संकल्प और आत्मसंयम से इस बात का संकेत मिलने लगा है। विगत 12 वर्षों से 140 करोड़ भारतीय जिस मनुष्य विरोधी संघी परियोजना से युद्ध रत हैं।
वह अब अपने अंतिम चरण में पहुंच गई है। “सब कुछ (मित्र) कॉर्पोरेट के नाम”, इस सूत्र वाक्य में भारत के पुनर्गठन का सार तत्व छिपा था। जिस तरह और जिस वेग से देश के संसाधनों को चंद कॉर्पोरेट घरानों के हाथ में सौंपने का अभियान हिंदुत्व मार्का राष्ट्रवादियों द्वारा चलाया जा रहा है। उसी में भारत के 90 करोड़ नागरिकों की दरिद्रता करोड़ों युवाओं की बेरोजगारी, 40% आबादी की भुखमरी, किसानों और परिवार सहित मजदूर की आत्महत्या के कारण छिपे हैं। इसके साथ ही लोकतांत्रिक संस्थाओं पर कब्जा व विध्वंस की कहानी जुड़ी है। यह सब कुछ कॉर्पोरेट ग्रीड को पूरा करने के लिए मोदी के नेतृत्व में फासीवादी रास्ते से क्रूरता पूर्वक संपन्न हो रहा है। इस दौर में जिस तरह से भारत का अडानीकरण हुआ है। वह अभूतपूर्व है।
उसने भारतीय नागरिकों के कंपनी राज -1 के क्रूर अनुभव को ताजा कर दिया है। अब लोकतांत्रिक भारत के साथ कॉर्पोरेट हिंदुत्व गठजोड़ के फासीवादी मॉडल का अंतर विरोध विकसित होते हुए चरम पर पहुंच चुका है। इस अंतर विरोध की सक्रियता के चलते जंतर मंतर से भारत की दूसरी आजादी की कहानी की पटकथा लिखी जा रही है। हिंदुत्व फासीवाद के हमले से रक्त-स्नात युवा भारत हर युग के शहीदों के वारिस होने का दावा कर रहा है। तो कॉर्पोरेट हिंदुत्व गठजोड़ के मनुष्य विरोधी संरचना से मुक्ति के लिए नए भारत के उठ खड़े होने के अलावा इससे और क्या समझा जा सकता है।
स्पष्ट है कि है यह युवा विस्फोट आजाद और लोकतांत्रिक भारत को विघटित कर संघ नीति मोदी सरकार द्वारा कॉर्पोरेट लार्डों और साम्राज्यवादी पूंजी की लूट के अधीन पुनर्गठित करने की प्रक्रिया के खिलाफ नए दौर का स्वतंत्रता संघर्ष है। जो 947 के पहले चले स्वतंत्रता संघर्ष से सर्वथा भिन्न विचारों और सामाजिक शक्तियों द्वारा निर्देशित और संचालित है। इसलिए इस दौर के प्रधान अंतर विरोध को हम-
“कॉर्पोरेट हिंदुत्व गठजोड़ मार्का फासीवाद बनाम सार्वभौम स्वतंत्रता लोकतान्त्रिक भारत” के अंतर विरोध के रूप में चिन्हित कर सकते हैं।
जंतर-मंतर पर जो कुछ भी घटित हुआ है। वह आजादी और लोकतंत्र की रक्षा के लिए बलिदान और सब कुछ न्योछावर कर देने का मानवीय उत्सव है। जो उपरोक्त अंतर विरोध के सक्रिय हो जाने का स्वाभाविक परिणाम है। वस्तुत: अब संघी समर्पणवादी राष्ट्रवाद के साथ सार्वभौम लोकतांत्रिक समावेशी प्रगतिशील राष्ट्रवाद की टक्कर शुरू हो चुकी है। इसलिए वर्तमान युवा भारत सर्वथा भिन्न तरह के रचनात्मक संघर्षों और महान नागरिकों के रंगमंच पर आगमन का उत्सव मना रहा है।
” जय भीम, लाल सलाम” के नारे से संकेत तो यही मिल रहा है कि भगत सिंह, करतार सिंह सराभा, अंबेडकर, गांधी जी के साथ स्वामी सहजानंद से लेकर नक्सलबाड़ी विद्रोह तक के हजारों बलिदानी भारतीयों की आत्मा पूंजी की मनुष्य विरोधी ताकतों के क्रूर लूट के खिलाफ एकताबद्ध हो उठ खड़ी हुई हैं।
कंपनी राज एक
प्लासी के युद्ध में सुजाउद्दौला की पराजय के बाद 100 वर्षों में ईस्ट इंडिया कंपनी ने एक-एक कदम आगे बढ़ते हुए अंततोगत्वा दिल्ली पर शिकंजा कस दिया। 1757 के बाद से कंपनी राज के खिलाफ सौ से ज्यादा किसान और आदिवासी विद्रोह हुए थे। जो 100 वर्षों बाद संघनीत होते हुए 1857 में भारत के प्रथम स्वतंत्रता संघर्ष के रूप में फूट पड़ा। इन सौ वर्षों में कंपनी द्वारा ब्रिटिश उद्योग जगत के स्वार्थ में लाए गए विभिन्न कानूनों ने भारत पर जो कहर ढाया और विपदा थोपी।
वैसा भारत के अतीत में कभी नहीं देखा गया था। इन कानूनों और नीतियों से जिस बड़े पैमाने पर कुटीर उद्योगों का विनाश हुआ और भुखमरी बेरोजगारी अकाल को जन्म दिया। वह अभूतपूर्व था। भारतीय समाज ने अतीत में ऐसी तबाही नहीं देखी थी। सोने की चिड़िया कहा जाने वाला समृद्ध निर्यातक देश कंपनी राज के 100 वर्षों में ब्रिटिश उद्योग जगत पर आश्रित हो अपनी स्वायत्तता खो बैठा। परिणाम स्वरूप 1957 में प्रथम स्वतंत्रता संघर्ष फूट पड़ा। जिसका मूल उद्देश्य था अपना देश वापस लेना।
“हम हैं, इसके मालिक हिंदुस्तान हमारा” के जय घोष के साथ शुरू हुआ संघर्ष भारत के एकल राष्ट्र के रूप में उठ खड़ा होने का आधार बना। जिसने त्याग बलिदान और देश प्रेम की नई परिभाषा गढ़ी।
उपलब्धियां
यहीं से शुरू हुई साझा दुश्मन के खिलाफ साझा संघर्ष की महान भारतीय परंपरा। जब एक बार नवजात भारतीय राष्ट्र ने अपने प्रधान शत्रु ब्रिटिश उपनिवेशवाद को पहचान लिया। तो इस चेतना ने भारत के नवजागरण के दरवाजे खोल दिये। ठोस आकार ले रहे राष्ट्र-राज्य ने साहित्य-संस्कृति, कला, ज्ञान-विज्ञान, तर्क के क्षेत्र में महान उपलब्धियां दर्ज की। देश को गुलामी से मुक्ति दिलाने के लिए शहीद होने की जिस परंपरा की शुरुआत 1857 में हुई। उसने भारतीय नागरिकों को एक नए तरह के आत्म सम्मान और गौरवबोध से भर दिया।
1857 से 1947 के कालखंड में हमारे पूर्वजों ने जिस तरह की उपलब्धियां दर्ज की। उसकी मिसाल भारतीय उपमहाद्वीप के अतीत के इतिहास के किसी कालखंड में नहीं मिलती। हमारे पूर्वजों की कुर्बानियों से हासिल उपलब्धियां का परिणाम था कि विभाजन की क्रूर त्रासदी का मुकाबला करते हुए हमने 1950 में लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष, गणराज्य हासिल किया। जिसे एक संविधान में सूत्रबद्ध किया गया। आज 78 वर्ष बाद इन्हीं उपलब्धियां को मिटा देने का अभियान हिंदुत्व कॉर्पोरेट गठजोड़ द्वारा चल रहा है। जिसे विश्व साम्राज्यवाद का समर्थन हासिल है।
1857 की भूमिका
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संघर्ष का असफल होना महत्वपूर्ण नहीं है। बल्कि इस संग्राम की महान उपलब्धि थी कि इसने भावी भारत का एजेंडा सेट कर दिया था। जिस रास्ते पर अगले 90 वर्षों तक भारतीय नागरिकों के संघर्ष को चलना था। वह सूत्र था- “ब्रिटिश उपनिवेशवाद (कम्पनी राज) बनाम भारतीय जन गण (राष्ट्र) का प्रधान अंतर्विरोध। “यही वह मुख्य अंतर विरोध था। जिसे हल करने के क्रम में नव जागरण की आधारशिला तैयार हुई। “स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है” का जय घोष गूंजा। आजादी बराबरी भाई चारा और लोकतंत्र के महान मानवीय मूल्य भारतीय समाज की जड़ता से टकराने लगे। हमारे देश ने स्वतंत्रता संघर्ष के विभिन्न रुपों और नायकों के योगदान से अंततोगत्वा सार्वभौम स्वतंत्रता लोकतांत्रिक गणराज्य हासिल किया।
जब कोई समाज अपने प्रधान शत्रु की शिनाख्त कर लेता है। तो उसके गर्भ में पल रही अजेय मानवीय मेधा ठोस आकार लेते हुए मानव जीवन के समस्त उच्च मूल्यों प्रवृत्तियों और विचारों को चरम तक विकसित करने में सक्षम होता है। यही भारत के स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान संभव हुआ था।
खतरा क्या था
इसका मतलब यह नहीं है की स्वतंत्रता आंदोलन एक रेखीय गति से आगे बढ़ा।इस दौरान उपनिवेशवाद की कोख में जन्मे दलाल वर्ग जैसे सामंती राजशाही और नवजात पूंजीपति के संगठित होने का खेल भी समानान्तर चला था। स्वतंत्रता संघर्ष के समय और बाद में भारत निर्माण के हर नाजुक मोड़ पर ये ताकतें और ज्यादा संगठित तथा हमलावर होती गईं। साम्राज्यवाद के निर्देशन में भारत में जब एलपीजी को लागू किया गया। तो इन शक्तियों को नया जीवनदान मिला। साम्राज्यवाद और दलाल नौकरशाह पूंजीवाद के खिलाफ अंतर विरोध के शिथिल होने के क्रम में इन ताकतों ने भारतीय गणराज्य पर कब्जा कर लिया। दो दशक तक चले उदारीकरण से भारत दक्षिण की तरफ मुड़ गया।
निर्णायक दुर्घटना
2014 में कॉर्पोरेट हिंदुत्व गठजोड़ के ठोस शक्ल लेने के बाद आजादी के संघर्ष की उपलब्धियां संकटग्रस्त हो गईं। देश भारतीय मार्का फासीवाद की दिशा में आगे बढ़ गया। एक-एक कर लोकतांत्रिक संस्थाओं मूल्यों आदर्शों को तिलांजलि दी जाने लगी। खुलेआम भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने का आह्वान किया गया और लोकतंत्र विरोधी उन्मादी ताकतें सड़क पर नंगा नाच करने लगीं। कमजोर वर्गों तथा अल्पसंख्यकों पर हमले की आड़ में भारत के कॉर्पोरेट टेकओवर की परियोजना आगे बढ़ी। पहले कानूनों को बुलडोज किया गया। जिसने देसी विदेशी पूंजी की लूट को सुगम बनाया। लोकतंत्र के स्पेस घटने लगे। सब कुछ बाजार और मुनाफे के हवाले कर दिया गया। सरकार ने नागरिकों के अधिकारों में कटौती शुरू की। शिक्षा, स्वास्थ्य, निजी हाथों में चला गया। चुनाव मैनेज हो गया। संस्थाएं कंट्रोल कर ली गईं। देश पर चुनावी तानाशाही थोपी गई।
संघर्ष की दिशा
स्वतंत्रता आंदोलन के मूल्यों और उपलब्धियां की रक्षा के लिए लड़ते हुए युवा प्रतिरोध ठोस सकल ले रहा है। आज का संघर्ष प्रतियोगी युवाओं के भविष्य को अंधकार में धकेल देने के लिए सचेतन ढंग से किए जा रहे परीक्षा में भ्रष्टाचार और पेपर लीक और एनटीए की विफलताओं के खिलाफ शुरू होकर अंततः कॉर्पोरेट हिंदुत्व गठजोड़ के केंद्र मोदी सरकार पर केंद्रित होने लगा है। जून-जुलाई में जंतर मंतर पर चले युवाओं के संघर्ष का ठोस योगदान यही है। इस आंदोलन ने लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष समावेशी भारत के मुख्य शत्रु की पहचान की। इसलिए भविष्य में फासीवादी आक्रमण के खिलाफ लोकतांत्रिक धर्म निरपेक्ष समावेशी भारत की पुनर्वापसी का विराट संघर्ष आकार लेगा और 140 करोड़ भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दूसरे दौर की चमत्कृत कर देने वाली महान उपलब्धियां के गवाह होंगे।
अतीत की निरंतरता
यहां से हमारा लोकतंत्र किस राह पर आगे बढ़ेगा। अभी कहना बहुत मुश्किल है। 1930 के दशक में भगत सिंह और उनके साथियों ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ जिस तरह के साहसिक प्रतिरोध और बलिदान का इतिहास रचा था। लगता है भारत के युवा उसी रास्ते पर आगे बढ़ चले हैं। चूंकि आज के शासक 1930 व 40 के दशक के महान स्वतंत्रता संघर्ष की उपलब्धियों के निषेध की पैदावार हैं। इसलिए यह दूसरा स्वतंत्रता संघर्ष इनके खिलाफ केंद्रित हो रहा है।
यहां याद रखना चाहिए की वर्तमान युवा पीढ़ी आजादी के दौर के क्रांतिकारियों के बलिदान के अनुभवों से समृद्ध है। और 100 वर्षों बाद पुनः 21वीं सदी में साम्राज्यवाद के समक्ष समर्पण करने वाली ताकतों से सड़कों पर संघर्षरत है। आज की दुनिया बीसवीं सदी के मध्य की दुनिया से बहुत आगे बढ़ चुकी है। यह तकनीकी क्रांति का युग है।
दुनिया जहां कॉर्पोरेट लार्डों की मुट्ठी में कैद है। वहीं आज का युवा मानव ज्ञान की उपलब्धियों से निर्मित तकनीक का संचालक है। यही कारण है कि इस कालखंड के युवाओं की चेतना और लक्ष्य में गुणात्मक फर्क है। अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ जहां भगत सिंह गांधी और अंबेडकर अलग-अलग मंचों से एक लक्ष्य की तरफ बढ़ रहे थे। वहीं इस दौर के युवा नायक तीनों महापुरुषों के लक्ष्यों को एकल अखंड में समाहित किए हुए आगे बढ़ रहे हैं। “जय भीम लाल सलाम” के नारे को इसी अर्थ में देखा जाना चाहिए।
जहां ये विश्व साम्राज्यवाद की युद्धोन्मादी नीतियों व विकासशील देशों को गुलाम बनाने के सम्पूर्ण प्रोजेक्ट के विरुद्ध दुनिया भर में संघर्षरत जन गण के साथ खड़े हैं। वहीं देश के अंदर साम्राज्यवादी एजेंटों और देश को पीछे ले जाने में संलग्न आंतरिक ताकतों के खिलाफ संघर्ष में मुब्तिला हैं।
सही लक्ष्य, सटीक निशाना
आज की युवा पीढ़ी अतीत की सभी दीवारों को ढहाते हुए आगे बढ़ी है। इसके ऊपर न अतीत का बोझ है न परंपरा का बन्धन। न सामंती संस्कृति की सड़ी-गली नैतिकता। यह पितृसत्ता के समस्त जकड़नों से मुक्त धर्म जाति भाषा क्षेत्र लिंग की विभाजनकारी रुढ़ियों और वर्जनाओं से मुक्त राष्ट्रीय के साथ- वैश्विक नागरिक है। जिस तरह मुक्त विचरण ( लूट) की आजादी पूंजी को हासिल है। उसी तरह जेनजी भी श्रम की आजादी का उपभोग करने के लिए युद्धरत है।
इसलिए जब भारत में कॉर्पोरेट हिंदुत्व गठजोड़ ने लोकतांत्रिक संस्थाओं और नागरिक आजादी पर विभिन्न तरह से हमला शुरू किया तो युवा तिलमिला उठा। यह पिछले 12 वर्षों से जेएनयू में कैंपस की स्वायत्तता और शैक्षणिक गुणवत्ता पर कॉर्पोरेट हिंदुत्व के हमले का प्रतिरोध कर रहा था। धीरे-धीरे इस प्रतिरोध की ऊर्जा भारत के सम्पूर्ण शैक्षणिक संस्थानों और प्रतियोगी छात्रों के व्यापक फलक तक जा पहुंची। जिस हद तक शिक्षा को खरीद और बिक्री की वस्तु बना देने की हिंदुत्व कॉरपोरेट गठजोड़ की नीति आगे बढ़ती गई। उसी हद यह युवा पीढ़ी इस साज़िश के खिलाफ शिक्षित और संगठित होती गई। जिसकी एक झलक दुनिया को पिछले दिनों जंतर मंतर पर देखने को मिली ।जिससे लुटेरे चकित और चिंतित हैं।
जेन-जी
यह युवा जिसे जेन जी कहा जा रहा है। आधुनिक विज्ञान तकनीक एआई की ताकत और स्पष्ट दृष्टि से लैस होने के कारण लोकतंत्र विरोधी कारपोरेट हिंदुत्व फासीवाद के खतरे को पहचानता है। इनमें आंतरिक और वाह्य दुश्मनों की साफ-साफ समझ है। आज के युवा इन चार मूल्यों और लक्ष्यों (साम्राज्यवादी गुलामी से मुक्ति, जाति विनाश और साम्प्रदायिक विभाजन का खात्मा और वैज्ञानिक लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष भारत के निर्माण की मुकम्मल परियोजना और सरकारी जवाबदेही) को हासिल करने के लिए लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष समता मूलक समाज निर्माण का झंडा उठाए आगे बढ़ रहे हैं ।इसलिए उनके निशाने पर जहां साम्राज्यवादी पूंजी का क्रूर शोषण से मुक्ति का मुद्दा है। वहीं सामाजिक समानता न्याय लिंग जाति धर्म भेद की सभी दीवारों को ढहा देने की उत्कट आकांक्षा भी है। इसलिए इन लोकतंत्र विरोधी बेड़ियों का संरक्षक और आक्रामक समर्थक संघ उनके निशाने पर है।
नये नायकों आगमन
ये मोदी राज के षड्यंत्र और दमन लोकतांत्रिक संस्थाओं के समर्पण और पतन ,कॉर्पोरेट हिंदुत्व गठ जोड़ के उग्र सांप्रदायिक आक्रमण और विभाजन, तर्क ज्ञान और वैज्ञानिक चेतना पर हो रहे हमले, हिंदू राष्ट्र के प्रतिगामी एजेंडे तथा घिनौना जाति-धर्म आधारित समर्पण वादी निम्न पूंजी वादी नेतृत्व की छिपी खुली गद्दारी के खिलाफ पूर्णतया सचेत है। ये आधुनिक लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष समावेशी भारत के सपने के लिए कुर्बान होने वाले आजादी के नए नायक हैं। जो अपनी दावेदारी पेश करने के लिए रंगमंच पर आ चुके हैं। इसलिए वर्तमान संघर्ष सूक्ष्म और संगठित फासीवादी हमले के खिलाफ उच्च स्तर के त्याग और बलिदान की तीव्रता के कारण रोमांचक हो गया है।
जो नीति व रणनीति को समृद्ध करते हुए निर्णायक संघर्ष के लिए कटिबद्ध है और वैचारिकी को अपडेट कर रहे हैं। इसने संघर्ष के किसी एक रूप का बंदी होने से इनकार कर दिया है। यह” सड़क से लेकर संसद तक ” उन सभी लोकतांत्रिक स्पेस की वापसी के लिए लड़ रहा है। जिसे पिछले 12 वर्षों में धीरे-धीरे छीन लिया गया। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से सीखते हुए आजाद भारत के निर्माण से हासिल सकारात्मक उपलब्धियों को बचाते हुए लोकतांत्रिक स्पेस के विस्तार के लिए लड़ रहा है। जिस कारण शासक वर्ग डरा हुआ है।
संघर्ष की दिशा
उदारीकरण के बाद निर्मित हुई वर्तमान विश्व व्यवस्था और उपनिवेशोत्तर विश्व के संघर्ष और सृजन के रास्ते सर्वदा भिन्न है और उन्हें होना भी चाहिए। वर्तमान युवा अपने अतीत की समस्त पीढ़ियों से अलग है! तकनीक सूचना और ज्ञान के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति ने मानव जीवन को बेहद सूक्ष्म और मारक संघर्षों की दुनिया में धकेल दिया है। जिससे अनुभव ज्ञान के साथ सामाजिक पहुंच और गतिशीलता के नए-नए दरवाजे खुलते हैं। आज की खगोलीय दुनिया का यथार्थ 20वीं सदी के उपनिवेश उत्तर काल से सर्वथा भिन्न है ।बीसवीं सदी के राजनीतिक सामाजिक उपकरण और अस्त्र- शस्त्र लगभग अप्रासंगिक हो गए हैं।
आज के दौर की सामाजिक गतिशीलता से रंग-बिरंगे नायकों के जन्म लेने और दावेदारी पेश करने व एक हद तक जन समर्थन हासिल कर लेने के कारण चुनौतियां उतनी ही जटिल हैं। इनकी गति तीव्र है। प्रभावित करने और नई पीढ़ी सहित अन्य तबकों तक पहुंचने की क्षमता अनंत है। इसलिए यथार्थ बिल्कुल भिन्न तरह का है। यही कारण है कि परिवर्तन की शक्तियों के लिए इस दौर को समझने के लिए उसके अनुकूल चलने की चुनौती उतनी ही गम्भीर है।
भारत में उदारीकरण और मंडल मंदिर के दौर के एजेंडे और मांगे भोथरा हो चुकी हैं। जहां वर्ग तेजी से बदल रहे हैं। जो एक हद तक आभासी होने के साथ यथार्थ जीवन में धुंधले प्रतिबिंब प्रेषित कर रहे हैं। यही कारण है कि जंतर-मंतर पर धर्म जाति भाषा क्षेत्र लिंग से मुक्त युवाओं की फौज खड़ी थी। सत्ता को संकट में डालने की उनकी क्षमता भी अदृश्य और गहरी है। इनके औजार एकदम आधुनिक हैं। वे “कर लो दुनिया मुठ्ठी में” के कारपोरेट ग्रीड के युग में पैदा होने के बावजूद उसका निषेध हैं।
युग की विशेषता
हमें याद रखना चाहिए कि ये युवा (आधुनिक ज्ञान तकनीक से लैस बेरोजगार व टेक्नीशियन) उपनिवेशोत्तर दुनिया की उपज हैं। यानी उपनिवेशवाद विरोधी संघर्षों के एक हद तक पृष्ठभूमि में चले जाने या स्वतंत्र देशों के निर्माण की पहली मंजिल पूरी होने के बाद इनका जन्म हुआ है। 1991 में सोवियत ब्लॉक के बिखरने और एलपीजी आने के बाद नव स्वतंत्र देशों में बने राष्ट्र राज्य का ढांचा ढहने लगा था।साम्राज्यवाद के प्रत्यक्ष नियंत्रण में खगोलीय दुनिया का निर्माण हुआ। जिसकी संचलन शक्ति मुख्यतः अमेरिकी साम्राज्यवाद के हाथ में थी। जिसको एक संगठित तंत्र (आईएमएफ वर्ल्ड बैंक और विश्व व्यापार संगठन) संचालित किया जा रहा था।
कहने का अर्थ यह है कि प्रत्यक्ष उपनिवेशवाद बनाम व्यापक जनता का अंतर विरोध-जिसने उपनिवेशवाद विरोधी प्रगतिशील राष्ट्रवाद को जन्म दिया था -के हद तक पृष्ठभूमि में चले जाने के सात दशक बाद जेन-जेड का जन्म हुआ है। उसे नवउपनिवेशवाद के युग में अपनी दावेदारी पेश करनी है।जिसके हथियार और वैचारिकी सर्वथा भिन्न होगे।
नवस्वतंत्र देशों में राष्ट्र राज्यका निर्माण’ सामंतवाद दलाल नौकरशाह पूंजीवाद और साम्राज्यवाद के गठजोड़’ के साथ संघर्ष से हुआ था। जिसे विश्व साम्राज्यवाद के अधीन ही काम करना था। यही इसका बुनियादी वर्ग चरित्र था। विश्व भर में जहां कहीं भी लोकतांत्रिक और साम्राज्यवाद विरोधी देशभक्त ताकतें अपने देश को स्वतंत्र निर्माण के रास्ते पर ले जाने के लिए संघर्ष की।
उन्हें साम्राज्यवादी हस्तक्षेप द्वारा रौंद दिया गया। पिछले 80 वर्षों का अमेरिकी नेतृत्व में विश्व साम्राज्यवाद का इतिहास रक्त रंजित रहा है। 1991 के बाद एक ध्रुवीय दुनिया में राष्ट्र राज्यों का गला दबा कर उन पर साम्राज्यवादी आर्थिक नीतियों थोपी गई हैं। इसके खिलाफ नए तरह के राष्ट्रवाद का अभ्युदय हो रहा है। जो उन देशों के शासक वर्ग के खिलाफ केंद्रित है।आज के संघर्ष के पीछे यही बुनियादी टकराव मुख्य भूमिका निभा रहा है।
षड्यंत्र और संघर्ष
उपनिवेशवाद के प्रारंभिक चरण में 1857 के महान स्वतंत्रता संघर्ष के द्वारा भारतीय राष्ट्र राज्य ने अपने जन्म की घोषणा की । जन्म काल से करोड़ों श्रेष्ठतम भारतीयों ने बलिदानों के द्वारा आजाद मुल्क की सभी अनिवार्यताओं को रचते गढ़ते हुए 1947 में एक मंजिल पार की । 1947 की आजादी के समय घायल विखंडित नवजात भारत ने 50 में संविधान अंगीकार कर लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य की नींव रखी। उसी दिन से साम्राज्यवादी ताकतों के प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष सहयोग से देश के अंदर की जड़ प्रतिक्रियावादी और लोकतंत्र विरोधी (दलाल नौकरशाह पूंजीवाद और मृतप्राय सामंतवाद) ताकतें इन उपलब्धियां को मिटा देने के लिए काम करती रहीं। 2014 में उन्हें पूर्ण सफलता मिली।
निर्णायक मोड़
तभी से लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करते हुए देश पर कॉरपोरेट हिंदुत्व फासीवाद को थोपने का खुला खेल चल रहा है। राज्य की संस्थाओं जैसे ईसी, ईडी सीबीआई न्याय पालिका से लेकर कार्यपालिका तक को पंगु कर दिया गया। संस्थाओं की निष्पक्षता और पारदर्शिता खत्म की जा चुकी है। खुलेआम अल्पसंख्यकों और कमजोर वर्गों और धर्मनिरपेक्ष प्रगतिशील ताकतों पर हमले और उनकी हत्याएं हुईं। उन्हें जेलों में भर दिया गया। आवाज उठाने वालों पर बेतहाशा जुल्म ढाए गए। राज्य अपनी तटस्थता खोकर बुलडोजर राज्य में बदल चुका है। इसके शिकार अल्पसंख्यक और गरीब तबके हो रहे हैं।
भाजपा और संघ के लंपट समूह एकतरफा हमला करते हैं। उन्हें राज्य का खुला संरक्षण प्राप्त है। कारपोरेट मीडिया सांप्रदायिक उन्माद और पाखंड फैलाने और बेशर्मी के हद तक जाकर झूठे नैरेटिव रचने में लगा है। संघ भाजपा का कारपोरेट घरानों में विलय हो गया है। क्रोनी पूंजीवाद के विकास विरोधी माडल ने देश को आयातक देश बना दिया है। जनता के धन से खड़े किए गए सरकारी संस्थानों पर कब्जा करना ही मित्र पूंजीपतियों का लक्ष्य है। मोदी के मित्र अडानी अकेले राष्ट्रीय पूंजीपति हैं। जिनके लिए नियम-कानून सब कुछ बदल दिये जाते हैं। उनके हवस का अंत नहीं है। जल जंगल जमीन खनिज सब कुछ उनके पास जा रहा है।अब सैन्य गोला-बारूद और सामान बनाने वाली औद्योगिक इकाइयों व प्रोजेक्ट सैनिक स्कूल उन्हें सौंपे जा रहे हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता दांव पर लगा दी गई है।
मोदी ही भारत
मोदी को देशका पर्याय बना दिया गया। उनकी ब्रांडिंग और सत्ता की हवस के लिए जनता की गाढ़ी कमाई के अरबों-खरबों फूंके जा रहे हैं। लोकतांत्रिक राज्य एक बौने और षड्यंत्रकारी व्यक्ति के हाथ में इस तरह से जकड़ लिया जायेगा। इसकी परिकल्पना स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओं ने नहीं की थी।
उम्मीद
मोदी राज के 12 वर्षों और संघ के जन्म के100 वर्षों में तैयार किए अदृश्य जाल को तोड़ने के लिए नवोदित भारत की ताकतें रंगमंच आ चुकी हैं। जिनकी शक्ति और क्षमता को समझने देखने के सारे पैमाने बदलने होंगे। 12वर्षों में पहली बार इन्होंने फासीवादी परियोजना को पीछे हटने पर मजबूर किया। डर और दमन के तंत्र को हवा में उड़ाते हुए सत्ताधारियों को विदूषक बना दिया है। शाहीन बाग की औरतें, किसान आंदोलनकारी, एनसीआर के मजदूर और वर्तमान छात्र युवा संघर्ष ने भारत में लोकतंत्र के भविष्य को जिंदा रखा है। आइए इंकलाबी तेवर के साथ इनका स्वागत करें।
(जयप्रकाश नारायण वामपंथी नेता और कार्यकर्ता हैं।)